Wednesday, August 7, 2019


 ख्वाशी  पर 

क्यो ........ ? है , ये दस्तूर  जमाना। 
दहलीज़  पार है ,रेखा  खींची। 
दे पर , फिर  कतर  दिए  हो। 
 हो सांस न , बस जान  हो  बाकी। 


बंद  पिजरे  में  रोती  मैना। 
हाय ! ये दस्तूर  जमाना -२ 
सिपाही  बन  दस्तूरी  रस्में। 
हर पल देती कैदी  पहरा -२ 
राम करे -२  पली  कुछ,रस्में -रीत  भुलाऊँ । 
लगा  पर ,फिर  उड़  में  जाऊं। 

खुले आसमान में ,बस उड़ना  चाहूं । 
आजादी  के पंख  लगा , कोसों  दूर  तक ,
मैं  उड़ती जाऊँ ।।





  








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