ख्वाशी पर
क्यो ........ ? है , ये दस्तूर जमाना।
दहलीज़ पार है ,रेखा खींची।
दे पर , फिर कतर दिए हो।
हो सांस न , बस जान हो बाकी।
बंद पिजरे में रोती मैना।
हाय ! ये दस्तूर जमाना -२
सिपाही बन दस्तूरी रस्में।
हर पल देती कैदी पहरा -२
राम करे -२ पली कुछ,रस्में -रीत भुलाऊँ ।
लगा पर ,फिर उड़ में जाऊं।
खुले आसमान में ,बस उड़ना चाहूं ।
आजादी के पंख लगा , कोसों दूर तक ,
मैं उड़ती जाऊँ ।।
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