Monday, December 24, 2018


ईनामी ठोंकर 


बाजार क्या खूब था 
नुमाईश भी खूब थी 
बिठाया गया प्यार से हमें 
लगी बोली ईनाम थी 
फैसला ही नासूर था
 खुदी थी बेजुवा बनी 
लगी बोली ईनाम थी 
चर्चा खास नूर था 
करना रंगे दीदार था 
शामिले न कद बददुआ थी 
हमारा ईनाम तमाम दुदकार था 
क्या नसीब अपना खराब था 
या कदरदान की नजर खराब थी 
बाजार क्या खूब था 
नुमाईश भी बेकदर थी 
कहुँ क्या तमाम जमाने 
ये रश्म बेकदर खराब थी 


नीरजा  भनोत 

माँगा था तूने दुआओ मे 
लिपट ममता के आँचल मे 
बन आई मैं मन्नत तेरी 
जीने तूने फक्र से दिया 
साथ तूने हर कदम मेरा दिया 
हौंसला भी मेरा बढाया 
मुश्किलों मे भी जीना तूने सिखाया 
बन माँ स्वार्थ का पाठ पढ़ाया 
कभी इंसानीयत के नाम का शबक तूने सिखाया 
थे वाकिफ़ बस तेरी नजर से 
क्या फिर मुत्तफिक़ हुए बेनजर से 
बिना शर्त अब तक जी जिंदगी 
हुए मजबूर जी शर्त की जिन्दगी 
कहा था ना गलत करना कभी 
ना गलत सहना कभी 
गलती से भी गलत करना ना लाड़ मेरे 
हुई ना मंजूर शर्त की जिंदगी 
तोड़ दी मैंने जंजीरे शर्त की 
ठान लिया मैंने ये 
पहुँचे शैतान परेशां करने मुझे 
कर सामना दिया हो शैतान को नाकाम  ऐसे 
मौत की आँखों मे आँखे डाल दी हो जैसे 
गई जब निकल मेरी जान 
था सकूँ बच गई कई जान 
शहादत-ऐ-कुर्बान  
लो हो गई मैं आज भारत की शान 
बनी इतिहासी अमर कहानी मेरी 
नाम था नीरजा भनोत 
यह है पहचान मेरी 


टुटा पेड़

पानी बरसा हमलाई लाया 
खड़ा साल से मैं जो भीगा 
गीली डाली पत्ती मुरझाई 
हवा ने तीखा बान चलाया 
घायल पत्तों ने शोर मचाया 
अपनी मानी सबसे करवाई 
चोट लगी पत्तों को नचवाया 
बूँदी पत्ते भारी अपना बोझ उठाया 
बिना सभा ताली पिटबाई 
झूमी डाली सब बिखर गई 
तड़पे पत्ते टूटी डाली 
सीना पेड़ का चीर दिया 
खत्म हुई अब कही कहानी 
सीमित होता बरसा का पानी 
बरसा का वार सहन कर जाता 
अगली साल खडा मैं रहा जाता 

















Saturday, December 22, 2018

उधार की ज़िन्दगी 

थी वो कोख भी उधार की 
ये ज़िन्दगी उधार की 
मिला प्यार भी उधार का 
घर आँगन वो भी था उधार का 
पुकारा गया लक्ष्मी कहकर हमें 
डूबी थी कर्ज में कर दिया कंगाल हमे 
डोली जब उठी 
मालूम चला किराये दार थे हम 
बताया घर के मालिक ने हमें 
थी वो आन भी शर्त की 
वो शान भी शर्त की 
खरा उतरना मजबूर थे हम 
थी ज़िन्दगी उधार की 
ख़तम जो ज़िन्दगी का एक कारवां 
निकला प्यार से डोली में सजा कर 
थी प्यार से सुनाई मौत की सजा हमें 
दे कीमत ख़रीदा  जो दूसरा घर आँगन यहाँ 
न रहा अपनी साँसों पे कोई हक़ यहाँ 
कीमत दे कर रहे थे किसी की नौकरी यहाँ 
मत पूछो कैसी चुका रहे थे कीमत यहाँ 
महँगा पड़ा इतना लुटा अपना सब कुछ 
अदा न कर सके महँगी कीमत यहाँ 
थे हाथ अपने दूसरे के कंगना यहाँ 
थी मांग भी अपनी दूसरे के नाम 
पर सजाई यहाँ 
माँग रहे थे मालिक की लम्बी 
उम्र की दुआ यहाँ 
थी ज़िन्दगी उधार की 
न नकदी यहाँ 
आया वो वक़्त भी सजाया गया 
प्यार से रुला कर अर्थी पे यहाँ 
थी ये आखिरी बिदाई ज़िन्दगी यहाँ 
कैद थी उधार की ज़िन्दगी यहाँ 
हुए अलबिदा  जब मिली मौत यहाँ 
तौबा की मिले न अब उधार की 
ज़िन्दगी यहाँ 
महँगी बड़ी पड़ी उधार की ज़िन्दगी यहाँ 
उधार की ज़िन्दगी यहाँ || 

तस्वीर 

माँ की मैंने तस्वीर बनाई 
भली सी ,सूरत उभर के आयी 
थी खाली झोली ,प्यार का दिल में भरे खजाने 
आँखें उसकी ,पर सपने मेरे 
माँ की नज़र में बसता था मैं 
उसके दिल का टुकड़ा था मैं 
टुकड़े जोड़े तस्वीर मेरी बन आई 
जिन्दा था मैं ,जान थी उसकी 
मेरी जान में जान थी उसकी 
शुक्र उसका जो माँ बनाई 
मैने बस तस्वीर बनाई 
दुआ प्यार का रंग माँ में पाया 
करी दुआएँ जब माँ को पाया 
माँ की मैने तस्वीर बनाई 
भली सी सूरत सामने आयी || 

Friday, December 21, 2018

चिड़िया तेरी 

जानी अनजानी कहानी तेरी
शुरु आँगन ,खत्म आँगन रही
आँगन में सदा कूदी रही
सूना आँगन ,बगीया बनाया
खाली मकान तेरा घर मैंने बनाया
ची -ची की आवाज लगाई
चिड़िया मैं तेरी कहलाई
नजर जो तेरी छूटी
नजर मे दुश्मन की चुभी
दे दाना प्यार से आँगन में बुलाया
शिकारी ने प्यार का,फिर जाल बिछाया
आँगन से तेरी चुप से चुराया
आवाज न कोई मेरी सुनी
थी आवाज भी मेरी दबी
बंद पिजरे में रोतीं रही
आश की आँखों में रोतीं ही रही
टूटे पंख मैंने फड़फड़ाये
पर वो मेरे कोई काम न आये
गूजी ना आँगन में अब आवाज कोई
तेरी चिड़िया अब जो कैद हुई
जानी -अनजानी कहानी कही
शुरी आँगन खत्म आँगन रही 

भली ये दूरियाँ 

दरवाजा खुला रखते हैं 
नजदीकियों से हम 
बाहर की दूरियों को 
तभी तो देख पाते हैं 
नजदीकियों ने इतने दर्द दिये 
छू लेने से हाय कितनी चोट खाते हैं 
दूरियों पे ही अब तो ऐतियार करते हैं 
नजदीकियों के दरमियाँ 
भली ये दूरियाँ बढ़ाते हैं 

माँ 

नाज़ किया खुदी पर 
फिकराना जी जिन्दगी 
ठहरी जब राह में ,
होश मिली ज़िन्दगी 
ठिठोरी खूब बनाई 
फिर भी साधी रही 
चुप्पी-सी सादगी 
उफ़ ! तक न भरी 
समझती रही मुझे 
मेरी माँ की गयी मौसकी 
दर्द में काम न आयी दवा कोई 
तब याद मुझे गोद तेरी क्यों आयी 
सहलाकर प्यार से , दर्द सब मेरे लिए 
पिलाकर प्यार भरी ममता की दवाई 
रात रात भर जगी 
और रात भर आँख मुँद मैं सोती रही 
मैं स्वार्था में सदा डूबी रही 
तु भला स्वार्थ बिना नौकरी मेरी करती रही 
माँगी न तूने इसकी कीमत कोई 
बस हाँ बस...... मैं जान गई 
तू कोई और नहीं तू मेरी माँ ,
जननी मेरी  माँ |  

Thursday, December 20, 2018

चिरागी सभा 

सभा चिरागी जुडी थी 
लगी  जली होड़ थी 
चराग तो हजारो थे 
जलते जिन्हे रहना था 
इम्तिहान अपना जोर था 
देखना जोर किसमें था 
चराग तो हज़ारो थे 
जलते जिन्हे रहना था 
सामना भी कुछ खास था 
बुझना या जलना बस बाकी था 
जलना मकाम था जिसका 
वो खुदी मकाम था 
बाकी सब बुझ गये 
बस ही जलता रहा 
चराग तो हज़ारो थे ,
जलते जिन्हे रहना था 
सभा चिरागी जुड़ी थी 
लगी जली होड़ थी 
जिन्दा थे तो जिक्र रोज था 
मर गए तो याद किया 
कर याद इंसानियत न दिखाओ 
मर गए कही याद न दिलाओ 
कर दफन ,जिक्र मेरा जुबा पे न लाओ 
लगा मरहमी दवा 
चोट मेरी ,घाव न लगाओ 
मर गए कही ये याद न दिलाओ 
भूली याद जो मेरी याद न दिलाओ 

ख्वाब तेरा 

पलको की दहलीज पे 
ख्वाब ने दस्तक कई दिए 
उफ़ ! सोई  थी आँख 
बेनजर ख्वाब किये 
जिद पे ख्वाब भी अड़ा 
बन हमसफ़र ख्वाब तेरा बाहर खड़ा 
न समझ पहरेदार था 
पहचान था 
पहचान न मेरी कर सकी 
ख्वाब तेरा बाहर खड़ा 
काली सुनी डिबिया 
खाली बन्द पड़ी 
एक पहर खुली 
फिर मूँद पड़ी 
बाहर तेरा ख्वाब खड़ा 
बैठ , ताक आँख सुनी समाऊ 
एक पल बंद 
खुली उम्मीद पर लगाउ 
तू ख्वाब में जगे ख्वाब में सोये 
ख़याली पालकी सपने सजाऊ 
कर दहलीज पार ,फिर ख्वाबी बहार लाउ 

सफलता का फलसफा 

कहते है सफलता हजम नहीं होती 
वह किसी में गुम नहीं होती 
गुमान में अपना पता बता ही देती 
कितना ही छिपा लो अपने में
 समां ही लेती 
सिर अपना किसी से झुकने नहीं देती 
गुरुर में इंसान को फॅसा ही लेती 
कर खत्म ,फिर पीछा छुड़ा ही लेती 
कहते है ! सफलता हजम नहीं होती 
वह किसी में गुम नहीं होती 

मैं (आत्म सम्मान )

है सुबह तो शाम भी है 
है धूप तो छाँव भी है 
है ख़ुशी तो गम भी है 
इसलिए आँख  मेरी नम भी है 
है आँख तो ख्वाब भी है 
कई ख्वाब टूटे भी है 
टूटे ख्वाब से बिखर जाते है 
पूरे हुए ख्वाब फिर बुनना सिखाते है 
देखते है ख्वाब तो जिन्दगी को बढ़ाते है 
न हो ख्वाब तो, 
ज़िन्दगी की राह में लड़खड़ाते है 
है जीत तो हार भी है 
हार से मिला धिक्कार भी है 
धिक्कार की रोज याद रखते है 
टूटी हुई हिम्मत को बढ़ाते है 
जीत की ओर रोज एक कदम बढ़ाते है 
है हौसले तो उम्मीद भी है 
उम्मीद कुछ कर दिखाने की है 
ये बात जीत हार की नहीं 
ये बात तो अपने स्वाभिमान की है 
मुझमें छिपी कही मैं की है || 

फिराती गम 

नाजो में पले थे 
दूर कितने गम थे 
देख तक़दीर , गम की नजर में चुभे थे 
हमलाई गम फिराक थे 
दूर कितने गम थे 
काले घोड़े पे सवार गम की चादर ओढे 
वो ले गया बिठा के 
कहता रहा देख तक़दीर 
अब गम ही गम थे 
आह ! कई दी 
गम अब तो छोड़ फिरात 
ये लब्ज भी अब अनसुने थे 
टूटी अब आशा 
लड़खड़ाए अब जो कदम 
मूँद आँख याद जो किया 
नाज़ो में पले थे 
दूर कितने गम थे
देख तक़दीर गम कितने कम थे