Thursday, December 20, 2018

मैं (आत्म सम्मान )

है सुबह तो शाम भी है 
है धूप तो छाँव भी है 
है ख़ुशी तो गम भी है 
इसलिए आँख  मेरी नम भी है 
है आँख तो ख्वाब भी है 
कई ख्वाब टूटे भी है 
टूटे ख्वाब से बिखर जाते है 
पूरे हुए ख्वाब फिर बुनना सिखाते है 
देखते है ख्वाब तो जिन्दगी को बढ़ाते है 
न हो ख्वाब तो, 
ज़िन्दगी की राह में लड़खड़ाते है 
है जीत तो हार भी है 
हार से मिला धिक्कार भी है 
धिक्कार की रोज याद रखते है 
टूटी हुई हिम्मत को बढ़ाते है 
जीत की ओर रोज एक कदम बढ़ाते है 
है हौसले तो उम्मीद भी है 
उम्मीद कुछ कर दिखाने की है 
ये बात जीत हार की नहीं 
ये बात तो अपने स्वाभिमान की है 
मुझमें छिपी कही मैं की है || 

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