उठती आवाज
कहीं बहते आँसू , कहीं भूख़ ने मारा कोई इंसान है
कोई सोता मकान में ,किसी का झोंपड़ा खुलेआम है
गरीब की आँख में ,पलते सपने भी गरीब हैं
चलते कहीं दौलती ,हक़ीकत हुए ख्याब हैं
मांगी दुआओं से ,पेट कभी भरता नहीं
बैठे जब , अमीरी के ठेकेदार हैं
सपने झूठे दिखा ,तसल्लियाँ हजार दी
तसल्लियों से भी, पेट भरता नहीं
जिंदगी -ए जरूरत पूरी होती नहीं
फटे हाल , कुचले जहां सारे गरीबी जज़्बात हैं
कैसा ये इंसाफ है , कैसा ये इंसाफ है
गरीबी की , उठी अब आवाज है
तसल्लियाँ अब, बचा कर अपने रखो
काम तुम्हारे अब ,जो आएंगी
नील में कमल खिलता नहीं ,कीचड़ में ही उसका वास है
काला धन खत्म ,काम अब सिक्के ही आएंगे
कह दो ,उन ठेकेदारों से , गरीब के दिन भी आएंगे गरीब के दिन आएंगे
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